Friday, 28 October 2011
Tuesday, 27 September 2011
Saturday, 17 September 2011
Saturday, 10 September 2011
कौन हो तुम, कहाँ हो तुम, मैं जानूँ ना...
कौन हो तुम, कहाँ हो तुम
मैं जानूँ ना...
मैं जानूँ ना...
नहीं हो तुम, ना आओगे कभी
ये मानूँ ना...
प्यार है नाम तुम्हारा
बस इतना ही तुम्हें जाना
और है यही सुना...
जोड़ कर और घटा कर
एक एक खट्टा-मीठा-कड़वा एहसास,
आखिर एक सपना सा है बुना...
बसी तो है एक तस्वीर मेरे मन में
पर कैसे दिखते हो तुम ये जानूँ ना...
रूठ कर लौट ना जाना जानेजाना
अब अगर मैं पहचानूँ ना…
Wednesday, 31 August 2011
याद आती है मेरी?
और मैं मुस्कुराती थी हर बार तुम्हें चौंका कर
कभी जब दार्शनिक से बन जाते थे तुम
तो मैं सुना करती थी घन्टों मन्त्रमुग्ध होकर… :)
अब बादलों की तरह उडते हैं ख्यालात रोज़ मेरे कमरे में
याद आती है मेरी? उन्हीं से पूछ्ती हूँ मैं बेचैन होकर
गुज़रे वक्त को छू लूँ किसी तरह ऐसी कोशिशें करती हूँ
जो अब नहीं हैं कहीं… तुम्हारे उन्हीं जादुई शब्दों में खोकर…
Labels:
ख्यालात,
गुज़रा वक्त,
जादुई शब्द,
दार्शनिक,
मन्त्रमुग्ध,
याद,
हैरान
Location:
Ajmer, Rajasthan, India
बस मन नहीं है
ये जो थोड़ी सी टूट फ़ूट हो गयी है दिल में…
उसे अब दुरुस्त करवाने का मन नहीं है…
ये जो ज़रा सा खालीपन है इस भरे भरे दिल में…
उसे अब किसी तरह भरवाने का मन नहीं है…
दुआएं तो मेरी बिन मांगे कबूल होती हैं…
बस ये ख्वाहिश पूरी करवाने का मन नहीं है…
प्यारी लगे है मुझे खट्टी मीठी ज़िन्दगी मेरी…
किस्मत में और कुछ सुधरवाने का मन नहीं है…
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