
खाली करने के बाद भी ये दिल
क्यों वक्त बेवक़्त यूँ भर आता है
बहा दिये सब जज़्बात तो फ़िर
क्यों अजनबी एक दर्द उभर आता है
चीखते चिल्लाते दौड़ते भागते वक्त में
क्यों कोई लम्हा अचानक ठहर जाता है
जश्न में डूबी हूँ, मैं भी तो दुनिया के साथ ही
फ़िर क्यों मुझसे खफ़ा, मेरा साया नज़र आता है
शोर सुनाकर बहलाती हूँ दिनभर मन की चुप्पी को
पर खोखले से लगते हैं अपने ही अल्फ़ाज़ जब
हर रात वो एक मायूस पहर आता है